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possitive think( सकारात्मक सोच)


सकारात्मक सोच:- 
हम जैसा सोचते है हमारे साथ वैसा ही होता है  अगर हम सकारात्मक सोचते है तो हमारे साथ सकारात्मक ही होगा बस हमें अपने अवचेतन मन में सोचने की जरूरत होता है जितना ज्यादा अवचेतन मन में सोचेंगे उतना ही जल्दी होता है।
दुनिया में अगर देखा जाए तो सबसे कोई ताकतवर चीज़ है तो वो है हमारी सोच सोच ही है जो हमे सफल बनाता है ।
कुछ भी करने से पहले हम क्या करते है ?
हम कुछ भी करने से पहले उनके बारे सोचते है कि हम ये करना है ऐसे करना है इस दिन इस महना  इतने तारीख को या इस टाइम में करना है उसके बाद हम उस काम को करना शुरू करते है 
जैसे:- 1) मै कामयाब बनूंगा
पहले हमने क्या किया अपने दिमाक में सोचा सोचने के बाद हम उसमें करना शुरू करते है।
2) हम जब अपने मोबाइल को हाथ में लिए फिर mind क्या किया एक word को सोचा सोचने के बाद हम क्या किए google में आए आने के बाद search box में जाकर को वर्ड सोचे है वो type किया और वो जो सोचे है उससे रिलेटेड आर्टिकल्स पेज हमारे सामने होता है। 

आज के प्रतिस्पर्धा के युग में सभी जाने-अनजाने तनाव से ग्रस्त हैं। तनाव की वजह चाहे छोटी हो तुच्छ हो या बड़ी, शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। नींद न आना, भूख न लगना या बहुत ज्यादा खाना, सदैव तबीयत का रोना रोना या स्वयं को सबसे ज्यादा बदनसीब समझना, दिमाग में सदैव दूसरे के व्यवहार से उथल-पुथल होते रहना, सिरदर्द, थकान, बेरुखी ये सब लक्षण इसी तनाव के नतीजे हैं। होते-होते यह तनाव तन, मन व दिमाग को बीमार बनाता है फिर डॉक्टर के चक्कर, दवाइयों के साइड इफेक्ट्स हमें और बीमार बनाते हैं। जीवन के प्रति, काम के प्रति उदासीनता आने लगती है व व्यक्ति हर परिस्थिति में नाखुश, उदास, अतृप्त व असंतोषी ही लगता है और धीरे-धीरे वह इसकी आदत बना लेता है। ऐसे लोग किसी भी उम्र के क्यों न हों, चेहरे पर उदासी के भाव लिए अपने दुखों व तबीयत का रोना रोते हुए ही दिखाई देते हैं व लोग भी उनसे दूर ही होते जाते हैं।
 
इस तनाव के कारण जिंदगी बोझ लगने लगती है, पर इससे उबरने का एकमात्र उपाय है स्वयं को समझाना, स्वयं को उत्साहित रखना व किसी भी परिस्थिति में जीवन को सर्वोपरि समझ उसकी छोटी-छोटी समस्याओं को नजरअंदाज करते हुए छोटी-छोटी बातों में प्रसन्नता ढूंढते हुए हर पल खुश रहने व प्रसन्न होने की मानसिकता विकसित करना। निम्न बातों से हम दुखी होते हैं। उन पर गहन मनन-चिंतन करने की आवश्यकता है, सोचने की जरूरत है कि क्या ये बातें जिनका हम तनाव लेते हैं, इतनी बड़ी हैं कि हम उन्हें महत्व दे-देकर खुद की खुशियां, जश्न, प्रसन्नता बिगाड़ रहे हैं।
 
1. लोग क्या कहेंगे : हमारा हर काम अपने हिसाब से, जो उचित हो, होना चाहिए। आप सबको प्रसन्न नहीं रख सकते इसीलिए जिसमें आपका, आपके परिवार का, समाज का हित हो, कीजिए। 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना' हमेशा ध्यान में रखते हुए अपनी जिंदगी का लुत्फ उठाते हुए जिंदगी का सफर तय कीजिए।
 
2. लोगों को बदलने की अपेक्षा रखना : हम किसी को बदल नहीं सकते। हर कोई अपने विचार व स्वभाव अनुसार ही व्यवहार करेगा अत: लोगों को बदलने का प्रयास कर दुखी होने से अच्छा है कि हम स्वयं में बदलाव लाएं।
 
3. असफलता का डर : हर कार्य को उचित ढंग से पूर्ण मेहनत व लगन से करना भर हमारे हाथ में है। सफल-असफल होना परिस्थितियों व कुछ हद तक भाग्य द्वारा निर्धारित होता है। अत: असफल होने का डर फिजूल है।
 

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