वर्तमान में जीना यानि साक्षी भाव में रहना।आप जो भी कर रहे हो,जैसे भी कर रहे हो,आप पूर्णतया उसके प्रति जागरूक हो।
आप स्वयं को ऐसे देख रहे हो जैसे हम आईने में खुद को देखते हैं।हमारा हर अच्छा बुरा कर्म हमारी नजर में होता है।
ऐसा करते करते हम समय की छननी का प्रयोग करके व्यर्थ को छाँटकर निकाल देते हैं और सार्थक को अपने पास रख लेते हैं।यह स्वयमेव ही सिद्ध होता जाता है।
विवेक का प्रयोग हर पल को खुलकर जीना और नकारात्मकता से दूर रहना सिखाता है।अनावश्यक झगड़ों और बहस से बचाता है।जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण हो तभी वर्तमान में जिया जा सकता है,अन्यथा भूत और भविष्य की चिन्ताएं वर्तमान में रहने ही नहीं देतीं।
साक्षीभाव के दैनिक अभ्यास से वर्तमान पल में रहना सीखा जा सकता है।ईश्वर प्रेम,विवेक और सकारात्मकता का साथ हो तो सोने पर सुहागा हो सकता है।
Comments
Post a Comment